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क्या फ़ाश करूँ ग़म-ए-निहाँ को | शाही शायरी
kya fash karun gham-e-nihan ko

ग़ज़ल

क्या फ़ाश करूँ ग़म-ए-निहाँ को

आसिफ़ुद्दौला

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क्या फ़ाश करूँ ग़म-ए-निहाँ को
पायाँ नहीं मेरी दास्ताँ को

क़िस्से को न पूछो मेरे हरगिज़
यारा ही नहीं दिल-ओ-ज़बाँ को

दरपय हैं नसीहतों के यारब
समझाऊँ मैं क्यूँ के दोस्ताँ को

गो हम ने सिलाया जेब-ओ-दामाँ
क्या कीजिएगा चश्म-ए-ख़ूँ-फ़िशाँ को

हो गर न वो शम्अ'-रू ही तो फिर
क्या आग लगाऊँ दूद-माँ को

गुज़रा था उधर से कल जो शायद
आया था वो मेरे इम्तिहाँ को

आए तो अभी थे मेरे साहब
ऐसी जल्दी चले कहाँ को

ऐ यारो समझ के बोलो उस बिन
मैं जाऊँगा बाग़-ओ-बोस्ताँ को

'आसिफ़' अभी मैं ने क्या कहा था
टुक बंद नहीं तिरी ज़बाँ को