EN اردو
कूचा-ए-यार में अब जाने गुज़र हो कि न हो | शाही शायरी
kucha-e-yar mein ab jaane guzar ho ki na ho

ग़ज़ल

कूचा-ए-यार में अब जाने गुज़र हो कि न हो

मुईन अहसन जज़्बी

;

कूचा-ए-यार में अब जाने गुज़र हो कि न हो
वही वहशत वही सौदा वही सर हो कि न हो

जाने इक रंग सा अब रुख़ पे तिरे आए न आए
नफ़स-ए-शौक़ से गुल शोला-ए-तर हो कि न हो

अब मुसलसल भी जो धड़के दिल-ए-नाशाद मिरा
किस को मालूम तिरे दिल को ख़बर हो कि न हो

क़हर में लुत्फ़ में मद-होशी ओ हुश्यारी में
वो मिरे वास्ते तख़्सीस-ए-नज़र हो कि न हो

हिज्र की रात थी इमकान-ए-सहर से रौशन
जाने अब उस में वो इमकान-ए-सहर हो कि न हो