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कुर्रा-ए-अर्ज़ को तारीक बना देना था | शाही शायरी
kurra-e-arz ko tarik bana dena tha

ग़ज़ल

कुर्रा-ए-अर्ज़ को तारीक बना देना था

रफ़ीक राज़

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कुर्रा-ए-अर्ज़ को तारीक बना देना था
हिज्र की शब में सितारों को बुझा देना था

कितनी दहशत है मिरे शहर में सन्नाटे की
नख़्ल-ए-आवाज़ यहाँ भी तो लगा देना था

तू कि मौजूद अगर मिस्ल-ए-हवा सेहन में था
शजर-ए-जामिद-ओ-साकित को हिला देना था

पुर-सुकूँ कब से मिरे दिल का है सहरा-ए-सुकूत
आ के इस में भी कभी हश्र उठा देना था

हुस्न के मंज़र-ए-सफ़्फ़ाक नज़र आते साफ़
पर्दा-ए-ख़्वाब को आँखों से हटा देना था

रंग कुछ सुब्ह-ए-क़यामत का अलग ही होता
चेहरा-ए-मेहर से भी रंग उड़ा देना था