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कुफ़्र-ए-इश्क़ आया बदल मुझ मोमिन-ए-दीं-दार तक | शाही शायरी
kufr-e-ishq aaya badal mujh momin-e-din-dar tak

ग़ज़ल

कुफ़्र-ए-इश्क़ आया बदल मुझ मोमिन-ए-दीं-दार तक

क़ासिम अली ख़ान अफ़रीदी

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कुफ़्र-ए-इश्क़ आया बदल मुझ मोमिन-ए-दीं-दार तक
नौबत-ए-बा-संदल-ओ-क़शक़ा है बल ज़ुन्नार तक

अष्ट का अश्लोक इक राहिब ने बुत-ख़ाने के बीच
मुझ को बतलाया कि भूला ग़ैर ज़िक्र-अज़़कार तक

शो'बदा दुनिया का कम फ़ुर्सत बहुत है जूँ हुबाब
ज़िंदगी है ता-ज़माना वा'दा-ए-इक़रार तक

काम है मतलब से चाहे कुफ़्र होवे या कि दीं
जा पहुँचता है किसी सूरत से अपने यार तक

'आफ़रीदी' छोड़ मत हरगिज़ दर-ए-पीर-ए-मुग़ाँ
हाथ आवे दुख़्तर-ए-रज़ साग़र-ए-सरशार तक