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कुछ सोच के इज़हार-ए-ख़यालात न करना | शाही शायरी
kuchh soch ke izhaar-e-KHayalat na karna

ग़ज़ल

कुछ सोच के इज़हार-ए-ख़यालात न करना

कर्रार नूरी

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कुछ सोच के इज़हार-ए-ख़यालात न करना
हर बात को सुनना वो तिरा बात न करना

ऐसा न हो दर-अस्ल तुम्हें अपना समझ लें
इस दर्जा ग़रीबों की मुदारात न करना

है फ़र्क़ मरातिब के लिए सारा ज़माना
मयख़ाने में तौहीन-ए-मुसावात न करना

इक फ़र्ज़ है ताज़ीम-ए-रवायात ब-हर-तौर
इक फ़र्ज़ है तरमीम-ए-रिवायात न करना

पैमाना-ब-कफ़ जब हो जवानी की हिकायत
इस बाब में संजीदा सवालात न करना

इक बार तवज्जोह से कोई बात तो सुन लो
फिर चाहे कभी हम से मुलाक़ात न करना

आसान है जाँ देना किसी बात पे 'नूरी'
दुश्वार है इज़हार-ए-ख़यालात न करना