कुछ सोच के इज़हार-ए-ख़यालात न करना
हर बात को सुनना वो तिरा बात न करना
ऐसा न हो दर-अस्ल तुम्हें अपना समझ लें
इस दर्जा ग़रीबों की मुदारात न करना
है फ़र्क़ मरातिब के लिए सारा ज़माना
मयख़ाने में तौहीन-ए-मुसावात न करना
इक फ़र्ज़ है ताज़ीम-ए-रवायात ब-हर-तौर
इक फ़र्ज़ है तरमीम-ए-रिवायात न करना
पैमाना-ब-कफ़ जब हो जवानी की हिकायत
इस बाब में संजीदा सवालात न करना
इक बार तवज्जोह से कोई बात तो सुन लो
फिर चाहे कभी हम से मुलाक़ात न करना
आसान है जाँ देना किसी बात पे 'नूरी'
दुश्वार है इज़हार-ए-ख़यालात न करना
ग़ज़ल
कुछ सोच के इज़हार-ए-ख़यालात न करना
कर्रार नूरी

