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कुछ इस क़दर मैं ख़िरद के असर में आ गया हूँ | शाही शायरी
kuchh is qadar main KHirad ke asar mein aa gaya hun

ग़ज़ल

कुछ इस क़दर मैं ख़िरद के असर में आ गया हूँ

राजेश रेड्डी

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कुछ इस क़दर मैं ख़िरद के असर में आ गया हूँ
सिमट के सारा का सारा ही सर में आ गया हूँ

ज़मीं उछाल चुकी आसमाँ ने थामा नहीं
मैं काएनात में बिल्कुल अधर में आ गया हूँ

ये ज़िंदगी भी मिरे हौसलों पे हैराँ है
समझ रही थी कि मैं उस के डर में आ गया हूँ

ज़रा सा फ़ासला मैं ने भी तय किया तो है
अगर से दो क़दम आगे मगर मैं आ गया हूँ

मिरी शनाख़्त की ख़ातिर छपी मिरी तस्वीर
न जीते-जी सही मर के ख़बर में आ गया हूँ

उदास हो गया हूँ फिर से इक ज़रा हँस कर
में घूम-घाम के फिर अपने घर में आ गया हूँ

न आ सका मैं तिरे हाथ की लकीरों में
यही बहुत है तिरी चश्म-ए-तर में आ गया हूँ

ये सोच कर कि न दूँ नाख़ुदा को ये ज़हमत
उतर के कश्ती से ख़ुद ही भँवर में आ गया हूँ

छुपा न पाया कभी ख़ुद को अपने शे'रों में
मैं जो हूँ जैसा हूँ अपने हुनर में आ गया हूँ