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कुछ ग़रज़ वज्ह मुद्दआ बाइस | शाही शायरी
kuchh gharaz wajh muddaa bais

ग़ज़ल

कुछ ग़रज़ वज्ह मुद्दआ बाइस

मुंशी देबी प्रसाद सहर बदायुनी

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कुछ ग़रज़ वज्ह मुद्दआ बाइस
क्यूँ ख़फ़ा हो गए हो क्या बाइस

मुझ से रूठे हो क्यूँ बिला बाइस
क्या ख़ता क्या क़ुसूर क्या बाइस

अब खुला ये कि जान जाने का
था सबब दिल ही दिल ही था बाइस

मैं ने छेड़ा था क्यूँ बिगड़ते न वो
ख़फ़गी की हुई ख़ता बाइस

मैं उन्हें चाहूँ वो ये ख़ुद चाहें
कोई ऐसा हो या ख़ुदा बाइस

नहीं मिलते न मिलिए बिस्मिल्लाह
पर बता दीजिए ज़रा बाइस

आज क्यूँ वो बिगड़ गए हम से
या इलाही न कुछ खुला बाइस

मर गए देख हम तिरा अंदाज़
है फ़ज़ा की तिरी अदा बाइस

जब कहा मैं ने आइए मिरे पास
दो घड़ी के लिए कहा बाइस

तुम हसीं हो तो चाहते हैं तुम्हें
यही बाइस है और क्या बाइस

कर लिया कैसा आप को तस्ख़ीर
'सेहर' हूँ वर्ना और क्या बाइस