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कुछ दर्द बढ़ा है तो मुदावा भी हुआ है | शाही शायरी
kuchh dard baDha hai to mudawa bhi hua hai

ग़ज़ल

कुछ दर्द बढ़ा है तो मुदावा भी हुआ है

शाहिद माहुली

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कुछ दर्द बढ़ा है तो मुदावा भी हुआ है
हर-सू दिल-ए-बेताब का चर्चा भी हुआ है

पुर्ज़े भी उड़े हैं मिरी वहशत के सर-ए-राह
नज़रों में हमारी ये तमाशा भी हुआ है

फूटे हैं कहीं आह भरे दिल के फफोले
पामाल कोई शहर-ए-तमन्ना भी हुआ है

माना कि कड़ी धूप में साए भी मिले हैं
इस राह में हर मोड़ पर धोका भी हुआ है

रौशन तो है यख़-बस्ता फ़ज़ाओं में कोई आग
तारीकी-ए-ज़िंदाँ में उजाला भी हुआ है

हर लम्हा कोई हादिसा रोके है मिरे पाँव
हर पल किसी ख़्वाहिश का तक़ाज़ा भी हुआ है

किस मोड़ पे आ पहुँचा है 'शाहिद' ये ज़माना
रफ़्तार क़यामत की है ठहरा भी हुआ है