कुछ भी अयाँ निहाँ न था कोई ज़माँ मकाँ न था
देर थी इक निगाह की फिर ये जहाँ जहाँ न था
साज़ वो क़तरे क़तरे में सोज़ वो ज़र्रे ज़र्रे में
याद तिरी किसे न थी दर्द तिरा कहाँ न था
इश्क़ की आज़माइशें और फ़ज़ाओं में हुईं
पाँव तले ज़मीं न थी सर पे ये आसमाँ न था
इश्क़ हरीम-ए-हुस्न में अपने सहारे रह गया
सब्र का भी पता न था होश का भी निशाँ न था
एक को एक की ख़बर मंज़िल-ए-इश्क़ में न थी
कोई भी अहल-ए-कारवाँ शामिल-ए-कारवाँ न था
इश्क़ ने अपनी जान को रोग कई लगा लिए
हिज्र-ओ-विसाल उमीद-ओ-बीम कौन बला-ए-जाँ न था
ख़लवतियान-ए-राज़ से हाल-ए-विसाल-ए-यार पूछ
हुस्न भी बे-नक़ाब था इश्क़ भी दरमियाँ न था
दौर-ए-हयात महज़ था इस के हरीम-ए-राज़ में
कैफ़-ओ-असर का ज़िक्र क्या ज़ीस्त का भी निशाँ न था
शिकवा-ए-दर-गुज़र-नुमा क्यूँ है कि हुस्न इश्क़ से
इतना तो बद-गुमाँ न था इतना तो सर-गराँ न था
ग़ज़ल
कुछ भी अयाँ निहाँ न था कोई ज़माँ मकाँ न था
फ़िराक़ गोरखपुरी

