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कोठे उजाड़ खिड़कियाँ चुप रास्ते उदास | शाही शायरी
koThe ujaD khiDkiyan chup raste udas

ग़ज़ल

कोठे उजाड़ खिड़कियाँ चुप रास्ते उदास

शोहरत बुख़ारी

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कोठे उजाड़ खिड़कियाँ चुप रास्ते उदास
जाते ही उन के कुछ न रहा ज़िंदगी के पास

दो पल बरस के अब्र ने दरिया का रुख़ किया
तपती ज़मीं से पहरों निकलती रही भड़ास

मिट्टी की सौंध जाते हुए साथ ले उड़ी
डाली का लोच पात की सब्ज़ी कली की बास

अश्कों से किस को प्यार है आहों से किस को उन्स
लेकिन ये दिल कि जिस को ख़ुशी आ सकी न रास

होश्यार ऐ नवेद-ए-अजल लुट न जाइयो
फिरता है कोई आठ-पहर दिल के आस पास

आँसू हो मय हो ज़हर हो आब-ए-हयात हो
जुज़ ख़ून-ए-आरज़ू न मुझे ज़िंदगी की प्यास

जैसे कभी तअल्लुक़-ए-ख़ातिर न रहा
यूँ रूठ कर चली गई 'शोहरत' हर एक आस