कोई सवाल-ए-ख़ुदा-ओ-सनम नहीं ऐ दोस्त
मैं क्या करूँ मिरी गर्दन में ख़म नहीं ऐ दोस्त
हमें यही है मुनासिब कि एक सू हो लें
जगह मियान-ए-वजूद-ओ-अदम नहीं ऐ दोस्त
ख़ुशामदों से निकलता नहीं है काम यहाँ
मोआ'मला है ख़ुदा से सनम नहीं ऐ दोस्त
अगरचे सर्द अँधेरे हैं बाइस-ए-तकलीफ़
मगर ये गर्म उजाले भी कम नहीं ऐ दोस्त
अजब मिज़ाज है इन मय-कदा नशीनों का
कि क़द्र-ए-जाम तो है क़द्र-ए-जम नहीं ऐ दोस्त
खुला है और खुलेगा 'जमील' सब के लिए
ये मय-कदा है कुनिशत-ओ-हरम नहीं ऐ दोस्त
ग़ज़ल
कोई सवाल-ए-ख़ुदा-ओ-सनम नहीं ऐ दोस्त
जमील मज़हरी

