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कोई सवाल-ए-ख़ुदा-ओ-सनम नहीं ऐ दोस्त | शाही शायरी
koi sawal-e-KHuda-o-sanam nahin ai dost

ग़ज़ल

कोई सवाल-ए-ख़ुदा-ओ-सनम नहीं ऐ दोस्त

जमील मज़हरी

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कोई सवाल-ए-ख़ुदा-ओ-सनम नहीं ऐ दोस्त
मैं क्या करूँ मिरी गर्दन में ख़म नहीं ऐ दोस्त

हमें यही है मुनासिब कि एक सू हो लें
जगह मियान-ए-वजूद-ओ-अदम नहीं ऐ दोस्त

ख़ुशामदों से निकलता नहीं है काम यहाँ
मोआ'मला है ख़ुदा से सनम नहीं ऐ दोस्त

अगरचे सर्द अँधेरे हैं बाइस-ए-तकलीफ़
मगर ये गर्म उजाले भी कम नहीं ऐ दोस्त

अजब मिज़ाज है इन मय-कदा नशीनों का
कि क़द्र-ए-जाम तो है क़द्र-ए-जम नहीं ऐ दोस्त

खुला है और खुलेगा 'जमील' सब के लिए
ये मय-कदा है कुनिशत-ओ-हरम नहीं ऐ दोस्त