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कोई नहीं आता समझाने | शाही शायरी
koi nahin aata samjhane

ग़ज़ल

कोई नहीं आता समझाने

सैफ़ुद्दीन सैफ़

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कोई नहीं आता समझाने
अब आराम से हैं दीवाने

तय न हुए दिल के वीराने
थक कर बैठ गए दीवाने

मजबूरी सब को होती है
मिलना हो तो लाख बहाने

बन न सकी अहबाब से अपनी
वो दाना थे हम दीवाने

नई नई उम्मीदें आ कर
छेड़ रही हैं ज़ख़्म पुराने

जल्वा-ए-जानाँ की तफ़्सीरें
एक हक़ीक़त लाख फ़साने

दुनिया भर का दर्द सहा है
हम ने तेरे ग़म के बहाने

फिर वहशत आई सुलझाने
होश ओ ख़िरद के ताने-बाने

फिर अपने आँचल से हवा दी
शो'ला-ए-गुल को बाद-ए-सबा ने

फिर वो डाल गए दामन में
दर्द की दौलत ग़म के ख़ज़ाने

आज फिर आँखों में फिरते हैं
अहद-ए-तमन्ना के वीराने

फिर तन्हाई पूछ रही है
कौन आए दिल को बहलाने

'सैफ़' वो ग़म भी तिश्ना-ए-ख़ूँ है
हम ज़िंदा हैं जिस के बहाने