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कोई दम थमता नहीं बारान-ए-अश्क | शाही शायरी
koi dam thamta nahin baran-e-ashk

ग़ज़ल

कोई दम थमता नहीं बारान-ए-अश्क

शाह आसिम

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कोई दम थमता नहीं बारान-ए-अश्क
अल-अमाँ अज़ चश्म-ए-पुर तूफ़ान-ए-अश्क

किस लब-ए-मय-गूँ की ख़्वाहिश है मुदाम
जोश-ज़न है ये मय-ए-जोशान-ए-अश्क

शोर नालों का मिरे सुन दम-ब-दम
सहमगीं हैं यक-क़लम तिफ़्लान-ए-अश्क

कश्ती-ए-गर्दूं यक़ीं है डूब जाए
बढ़ चला है बहर-ए-बे-पायान-ए-अश्क

शौक़ में उस सिल्क-ए-दंदाँ की मुदाम
हैं निकलते ये दुर-ए-ग़लतान-ए-अश्क

जल के होता ख़ाक सोज़-ए-दिल से तन
गर न करती आँख ये सामान-ए-अश्क

फ़ैज़ से ख़ून-ए-दिल-ए-मजरूह की
रश्क-ए-गुलशन हो गया दामान-ए-अश्क

धो गया ख़ातिर से जानाँ की ग़ुबार
जान पर मेरी है ये एहसान-ए-अश्क

हूँ मैं गिर्यां इश्क़-ए-ख़ादिम-शाह मैं
इस लिए 'आसिम' हूँ मैं नाज़ान-ए-अश्क