कोई भी शय कहाँ नायाब है हमारे लिए
खुला हुआ तो दर-ए-ख़्वाब है हमारे लिए
हमें ही रौशनी उस की नज़र नहीं आती
चराग़ तो पस-ए-मेहराब है हमारे लिए
पलक झपकते ही सब कुछ नया सा लगता है
ये ज़िंदगी भी कोई ख़्वाब है हमारे लिए
उतरते जाते हैं पहनाइयों में दरिया की
कि जलती शम्अ' तह-ए-आब है हमारे लिए
हमीं ने बंद किए हैं तमाम दरवाज़े
ये शहर आज भी बेताब है हमारे लिए
बस एक मौज ने ये हाल कर दिया अपना
हर एक मौज ही गिर्दाब है हमारे लिए
हर एक शख़्स के दा'वे अलग अलग 'आलम'
अगरचे बाम पे महताब है हमारे लिए
ग़ज़ल
कोई भी शय कहाँ नायाब है हमारे लिए
आलम ख़ुर्शीद

