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कोई भी शय कहाँ नायाब है हमारे लिए | शाही शायरी
koi bhi shai kahan nayab hai hamare liye

ग़ज़ल

कोई भी शय कहाँ नायाब है हमारे लिए

आलम ख़ुर्शीद

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कोई भी शय कहाँ नायाब है हमारे लिए
खुला हुआ तो दर-ए-ख़्वाब है हमारे लिए

हमें ही रौशनी उस की नज़र नहीं आती
चराग़ तो पस-ए-मेहराब है हमारे लिए

पलक झपकते ही सब कुछ नया सा लगता है
ये ज़िंदगी भी कोई ख़्वाब है हमारे लिए

उतरते जाते हैं पहनाइयों में दरिया की
कि जलती शम्अ' तह-ए-आब है हमारे लिए

हमीं ने बंद किए हैं तमाम दरवाज़े
ये शहर आज भी बेताब है हमारे लिए

बस एक मौज ने ये हाल कर दिया अपना
हर एक मौज ही गिर्दाब है हमारे लिए

हर एक शख़्स के दा'वे अलग अलग 'आलम'
अगरचे बाम पे महताब है हमारे लिए