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कोई बे-वज्ह क्यूँ ख़फ़ा होगा | शाही शायरी
koi be-wajh kyun KHafa hoga

ग़ज़ल

कोई बे-वज्ह क्यूँ ख़फ़ा होगा

मोहसिन ज़ैदी

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कोई बे-वज्ह क्यूँ ख़फ़ा होगा
कुछ तो उस को बुरा लगा होगा

आगे जा कर ठहर गया होगा
वो मिरी राह तक रहा होगा

छोड़ आए थे हम जला के जिसे
वो दिया कब का बुझ गया होगा

जब वो आवाज़ थम गई होगी
शब का सन्नाटा बोलता होगा

कैसे मा'लूम हो कि आख़िर-ए-वक़्त
उस ने क्या कुछ कहा-सुना होगा

क्यूँ हवा तेज़ अभी से चलने लगी
ग़ुंचा कम कम अभी खिला होगा

लहजा उस का भी कुछ था अपना सा
वो भी अपने दयार का होगा

पहला सज्दा जहाँ किया था वहीं
आख़िरी सज्दा भी अदा होगा

हो न हो मंज़िल आ गई 'मोहसिन'
चंद क़ौमों का फ़ासला होगा