कोई बे-वज्ह क्यूँ ख़फ़ा होगा
कुछ तो उस को बुरा लगा होगा
आगे जा कर ठहर गया होगा
वो मिरी राह तक रहा होगा
छोड़ आए थे हम जला के जिसे
वो दिया कब का बुझ गया होगा
जब वो आवाज़ थम गई होगी
शब का सन्नाटा बोलता होगा
कैसे मा'लूम हो कि आख़िर-ए-वक़्त
उस ने क्या कुछ कहा-सुना होगा
क्यूँ हवा तेज़ अभी से चलने लगी
ग़ुंचा कम कम अभी खिला होगा
लहजा उस का भी कुछ था अपना सा
वो भी अपने दयार का होगा
पहला सज्दा जहाँ किया था वहीं
आख़िरी सज्दा भी अदा होगा
हो न हो मंज़िल आ गई 'मोहसिन'
चंद क़ौमों का फ़ासला होगा
ग़ज़ल
कोई बे-वज्ह क्यूँ ख़फ़ा होगा
मोहसिन ज़ैदी

