कोई अन-देखी फ़ज़ा तस्वीर करना चाहिए
ख़्वाब की बुनियाद पर तामीर करना चाहिए
मैं भटकता फिर रहा हूँ वाहिमों के दरमियाँ
गर्द लिपटी रूह की ततहीर करना चाहिए
जिन दिनों दीवानगी ठहरी हुई हो ज़ात में
एक दुनिया उन दिनों तस्ख़ीर करना चाहिए
जिस सदा में सौ तरह के रंग झिलमिल करते हों
वो सदा हर हाल में तस्वीर करना चाहिए
जल्द-बाज़ी दे गई है रत-जगों के सिलसिले
फ़ैसले में थोड़ी सी ताख़ीर करना चाहिए
अब बगोले मुझ में हैं और मैं बगूलों में 'ख़याल'
दश्त में दीवानगी ज़ंजीर करना चाहिए
ग़ज़ल
कोई अन-देखी फ़ज़ा तस्वीर करना चाहिए
अहमद ख़याल

