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कोहसार तो कहीं पे समुंदर भी आएँगे | शाही शायरी
kohsar to kahin pe samundar bhi aaenge

ग़ज़ल

कोहसार तो कहीं पे समुंदर भी आएँगे

क़ैसर ख़ालिद

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कोहसार तो कहीं पे समुंदर भी आएँगे
अपनी तलाश में नए मंज़र भी आएँगे

पामाल रास्तों से बग़ावत नहीं गुनाह
क़द्रें नई हैं तो नए रहबर भी आएँगे

सूरत में रंग-ओ-नूर की, फूलों की, हम कहीं
लौह-ए-जहाँ पे हर्फ़-ए-मुकर्रर भी आएँगे

नाज़ुक-मिज़ाज देते हैं हर लम्हा इम्तिहाँ
शीशों से जिस्म के लिए पत्थर भी आएँगे

जब जब बढ़ेगी ज़ुल्मत-ए-ग़ारत-गर-ए-यक़ीं
आवाज़-ए-हक़ पे कटने नए सर भी आएँगे

बदले हैं हुस्न-ओ-इश्क़ तो अक़दार भी नई
ले कर नए जवाज़ सितमगर भी आएँगे

महरूमियाँ कहीं तो कहीं पर नवाज़िशें
क्या ये सवाल बर-सर-ए-महशर भी आएँगे

आए हो शहर-ए-ज़र की चका-चौंद में मगर
महलों के साथ राह में बे-घर भी आएँगे

मायूस हो के जोहद-ए-मुसलसल न छोड़ना
ज़ख़्मों के ब'अद हाथों में गौहर भी आएँगे

हैं पत्थरों से लोग ही इस शहर-ए-संग में
क्या उन के वास्ते नए मंज़र भी आएँगे

देवी को मुंसिफ़ी की मिलेगा क़रार तब
जब अपना सर झुकाए सितमगर भी आएँगे

'ख़ालिद' तिरा वजूद गवारा नहीं जिन्हें
बज़्म-ए-सुख़न में क्या वो सुखनवर भी आएँगे