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कोह के हों बार-ए-ख़ातिर गर सदा हो जाइए | शाही शायरी
koh ke hon bar-e-KHatir gar sada ho jaiye

ग़ज़ल

कोह के हों बार-ए-ख़ातिर गर सदा हो जाइए

मिर्ज़ा ग़ालिब

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कोह के हों बार-ए-ख़ातिर गर सदा हो जाइए
बे-तकल्लुफ़ ऐ शरार-ए-जस्ता क्या हो जाइए

बैज़ा-आसा नंग-ए-बाल-ओ-पर है ये कुंज-ए-क़फ़स
अज़-सर-ए-नौ ज़िंदगी हो गर रिहा हो जाइए

वुसअत-ए-मशरब नियाज़-ए-कुल्फ़त-ए-वहशत 'असद'
यक-बयाबाँ साया-ए-बाल-ए-हुमा हो जाइए