EN اردو
कितनी सरकश भी हो सर-फिरी ये हवा रखना रौशन दिया | शाही शायरी
kitni sarkash bhi ho sar-phiri ye hawa rakhna raushan diya

ग़ज़ल

कितनी सरकश भी हो सर-फिरी ये हवा रखना रौशन दिया

अमजद इस्लाम अमजद

;

कितनी सरकश भी हो सर-फिरी ये हवा रखना रौशन दिया
रात जब तक रहे ऐ मिरे हम-नवा रखना रौशन दिया

रौशनी का वज़ीफ़ा नहीं वो चले रास्ता देख कर
वो तो आज़ाद है मिस्ल-ए-मौज-ए-सबा रखना रौशन दिया

रात कैसी भी हो ख़ौफ़ के चोर की घात कैसी भी हो
अपनी उम्मीद का अपने विश्वास का रखना रौशन दिया

शब की बे-अंत ज़ुल्मत से लड़ सकती है एक नन्ही सी लौ
राह भूले हुओं को है बाँग-ए-दरा रखना रौशन दिया

आश्ना की सदा घुप-अँधेरे में बन जाती है रौशनी
इस शब-ए-तार में अपनी आवाज़ का रखना रौशन दिया

रौशनी की शरीअत में रोज़-ए-अज़ल से यही दर्ज है
जोत से जोत जलती रहेगी सदा रखना रौशन दिया

मुझ से 'अमजद' कहा झिलमिलाते हुए अख़्तर-ए-शाम ने
उस को आना ही है वो ज़रूर आएगा रखना रौशन दिया