किसी को देखते क्यूँ आह रोते
जो बस चलता तो हम पैदा न होते
वो अश्क ऐ दर्द-ए-दिल आँखों में होते
जो दाग़-ए-मासियत दामन से धोते
सहर होने को आई रोते रोते
कहीं वो आस्ताँ मिलता तो सोते
झुकी जाती हैं आँखें बार-ए-ग़म से
किसी आग़ोश में सर रख के सोते
नज़र देखा किए उन की हमेशा
यही हसरत रही हम जान खोते
'जिगर' हम हैं तो ख़ालिक़ भी है कोई
न होता कुछ अगर हम ही न होते
ग़ज़ल
किसी को देखते क्यूँ आह रोते
जिगर बरेलवी

