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किसी के सामने इज़हार-ए-दर्द-ए-जाँ न करूँ | शाही शायरी
kisi ke samne izhaar-e-dard-e-jaan na karun

ग़ज़ल

किसी के सामने इज़हार-ए-दर्द-ए-जाँ न करूँ

मोहसिन एहसान

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किसी के सामने इज़हार-ए-दर्द-ए-जाँ न करूँ
उधर उधर की कहूँ ज़ख़्म-ए-दिल अयाँ न करूँ

लगा के आग बदन में वो मुझ से चाहता है
कि साँस लूँ तो फ़ज़ा को धुआँ धुआँ न करूँ

मैं उस को पढ़ता हूँ इंजील-ए-आरज़ू की तरह
समझ में आए तो मा'नी हर इक बयाँ न करूँ

ग़ज़ब है मुझ से तवक़्क़ो' ज़माना रखता है
कि पा-शिकस्तगी में रंज-ए-रफ़्तगाँ न करूँ

ये हुक्म मुझ को मिला क़स्र-ए-ख़ुसरवी से कि मैं
फ़ुग़ाँ सुनूँ मगर अंदाज़ा-ए-फ़ुगाँ न करूँ

मज़े से सोऊँ अगर हाथ आए शाम-ए-फ़िराक़
मैं एक लम्हा भी इस शब का राएगाँ न करूँ

उठा के सर पे फिरूँ बार-ए-आरज़ू 'मोहसिन'
कमर को ख़म मैं कभी सूरत-ए-कमाँ न करूँ