किसी के हुस्न-ए-आलम-ताब की तनवीर के सदक़े
किसी बद-बख़्त की सूरत भी पहचानी नहीं जाती
मुरव्वत की अदा पर बंद आँखें कर के लुट जाना
ये नादानी सही लेकिन ये नादानी नहीं जाती
वहाँ दिल ले चला है फिर वही इक बात कहने को
कही जाती है जो अक्सर मगर मानी नहीं जाती
ख़ुदावंदा फिर आख़िर क्या तमन्ना है मिरे दिल की
वो पहलू में भी हैं लेकिन परेशानी नहीं जाती
किया था मैं ने शिकवा आप ने आँखें झुका ली थीं
हुई मुद्दत मगर अब तक पशेमानी नहीं जाती
वही है अपनी रिंदी और वही वाइ'ज़ की फ़हमाइश
बुरी आदत कोई भी हो ब-आसानी नहीं जाती
ग़ज़ल
किसी के हुस्न-ए-आलम-ताब की तनवीर के सदक़े
हरी चंद अख़्तर

