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किसी भी काम का मेरा हुनर नहीं न सही | शाही शायरी
kisi bhi kaam ka mera hunar nahin na sahi

ग़ज़ल

किसी भी काम का मेरा हुनर नहीं न सही

रूही कंजाही

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किसी भी काम का मेरा हुनर नहीं न सही
हवा-ए-दहर मुआफ़िक़ अगर नहीं न सही

कुआँ है और सभी नाक़िदान-ए-शेर-ओ-अदब
मिरे कलाम पे उन की नज़र नहीं न सही

ये तेरी बज़्म है याँ तेरा सिक्का चलता है
कोई भी बात मिरी मो'तबर नहीं न सही

यही बहुत है कि कुछ लोग सोचने तो लगे
कोई भी मेरा अगर हम नज़र नहीं न सही

हवा का क्या है हवा रुख़ बदलती रहती है
तिरी निगाह अगर आज इधर नहीं न सही

दिलों से उठने लगी हैं अजब अजब लहरें
किसी भी आँख में कोई ख़बर नहीं न सही

इलाज में तो न मैं कोई कसर छोड़ूँगा
किसी दवा में भी कोई असर नहीं न सही

शजर लगाए हैं मैं ने ये कम नहीं एज़ाज़
मिरे नसीब में 'रूही' समर नहीं न सही