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ख़ून से जब जला दिया एक दिया बुझा हुआ | शाही शायरी
KHun se jab jala diya ek diya bujha hua

ग़ज़ल

ख़ून से जब जला दिया एक दिया बुझा हुआ

पीरज़ादा क़ासीम

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ख़ून से जब जला दिया एक दिया बुझा हुआ
फिर मुझे दे दिया गया एक दिया बुझा हुआ

अपने तो अहद-ए-शौक़ के मरहले सब अज़ीज़ थे
हम को विसाल सा लगा एक दिया बुझा हुआ

एक ही दास्तान-ए-शब एक ही सिलसिला तो है
एक दिया जला हुआ एक दिया बुझा हुआ

शोला हवा-नज़ाद था फिर भी हवा के हाथ ने
बस यही फ़ैसला लिखा एक दिया बुझा हुआ

महफ़िल-ए-रंग-ओ-नूर की फिर मुझे याद आ गई
फिर मुझे याद आ गया एक दिया बुझा हुआ

मुझ को नशात से फ़ुज़ूँ रस्म-ए-वफ़ा अज़ीज़ है
मेरा रफ़ीक़-ए-शब रहा एक दिया बुझा हुआ

दर्द की काएनात में मुझ से भी रौशनी रही
वैसे मेरी बिसात क्या एक दिया बुझा हुआ

सब मिरी रौशनी-ए-जाँ हर्फ़-ए-सुख़न में ढल गई
और मैं जैसे रह गया एक दिया बुझा हुआ