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ख़ुश्क उस की ज़ात का सातों समुंदर हो गया | शाही शायरी
KHushk uski zat ka saton samundar ho gaya

ग़ज़ल

ख़ुश्क उस की ज़ात का सातों समुंदर हो गया

इक़बाल साजिद

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ख़ुश्क उस की ज़ात का सातों समुंदर हो गया
धूप कुछ ऐसी पड़ी वो शख़्स बंजर हो गया

आँगन आँगन ज़हर बरसाएगी उस की चाँदनी
वो अगर महताब की सूरत उजागर हो गया

मेरे आधे जिस्म की उस को लगेगी बद-दुआ
कल ख़बर आ जाएगी वो शख़्स पत्थर हो गया

किस ने अपने हाथ से ख़ुद मौत का कतबा लिखा
कौन अपनी क़ब्र पर इबरत का पत्थर हो गया

क़ुर्ब जब हद से बढ़ा दूरी मुक़द्दर हो गई
उस का मिलना भी न मिलने के बराबर हो गया

मैं कि बाहर की फ़ज़ा में क़ैद था जिस के सबब
आज वो ख़ुद जिंस के पिंजरे के अंदर हो गया

मुफ़्त में तक़्सीम की 'साजिद' मता-ए-शायरी
जिस ने अपना क़ुर्ब अपनाया वो शायर हो गया