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ख़ुश्बू हैं तो हर दौर को महकाएँगे हम लोग | शाही शायरी
KHushbu hain to har daur ko mahkaenge hum log

ग़ज़ल

ख़ुश्बू हैं तो हर दौर को महकाएँगे हम लोग

रज़ी अख़्तर शौक़

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ख़ुश्बू हैं तो हर दौर को महकाएँगे हम लोग
मिट्टी हैं तो पल भर में बिखर जाएँगे हम लोग

ये शो'ला-ए-बे-मेहर तो बस आँच ही देगा
हाँ और तिरे हुस्न से क्या पाएँगे हम लोग

क्या हम से बचोगे कि जिधर जाएँगे नज़रें
इस आइना-ख़ाने में झलक जाएँगे हम लोग

कहना है ये ना-क़दरी-ए-अर्बाब-ए-जहाँ से
इक बार जो बिखरे तो न हाथ आएँगे हम लोग

बैठो कि अभी है ये घनी छाँव मयस्सर
ढलता हुआ साया हैं गुज़र जाएँगे हम लोग

हम रूह-ए-सफ़र हैं हमें नामों से न पहचान
कल और किसी नाम से आ जाएँगे हम लोग