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खुलती है गुफ़्तुगू से गिरह पेच-ओ-ताब की | शाही शायरी
khulti hai guftugu se girah pech-o-tab ki

ग़ज़ल

खुलती है गुफ़्तुगू से गिरह पेच-ओ-ताब की

सलीम शाहिद

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खुलती है गुफ़्तुगू से गिरह पेच-ओ-ताब की
पर किस से खुल के बात करें इज़्तिराब की

काफ़ी नहीं है चश्म-ए-तमाशा को रंग-ए-गुल
लाएँ कहाँ से ज़ख़्म में ख़ुश्बू गुलाब की

अपनी बरहनगी को बचा तेज़ धूप से
किरनों में बू है जलते हुए आफ़्ताब की

कुछ मैं शजर से टूट के बे-ख़ानुमाँ हुआ
हाँ कुछ हवा ने भी मिरी मिट्टी ख़राब की

इक उम्र हो गई है कि मैं जांकनी में हूँ
ऐसी ठहर गई है ये साअ'त अज़ाब की

एहसास-ए-तीरगी है तो सूरज उछाल दे
वर्ना दुआ न माँग यहाँ इंक़िलाब की

महकूम बस्तियों से सरकने लगी है धूप
वो अहद हूँ कि जिस ने शफ़क़ बे-नक़ाब की

बिजली चली गई तो वो आँखों में रह गया
अब छू के पढ़ रहा हूँ इबारत किताब की

'शाहिद' कहाँ से हो के गुज़रती है आब-जू
रंगत तमाम सुर्ख़ है क्यूँ सत्ह-ए-आब की