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खुलेगा नाख़ुन-ए-शमशीर से उक़्दा मिरे दिल का | शाही शायरी
khulega naKHun-e-shamshir se uqda mere dil ka

ग़ज़ल

खुलेगा नाख़ुन-ए-शमशीर से उक़्दा मिरे दिल का

मीर कल्लू अर्श

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खुलेगा नाख़ुन-ए-शमशीर से उक़्दा मिरे दिल का
किसी क़ातिल से है आसान होना मेरी मुश्किल का

पस-ए-मुर्दन भी ये मंज़ूर है नज़्ज़ारा क़ातिल का
चराग़-ए-गोर में आलम हुआ है चश्म-ए-बिस्मिल का

ग़ुबार-ए-दहर से इक लहज़ा भी ख़ाली नहीं होता
इलाही शीशा-ए-साअत है क्या शीशा मिरे दिल का

यही गर ज़िंदगी भर तब-ए-आली का रहा आलम
बनेगा मर गए पर आसमाँ दसवाँ मिरे गिल का

न तोड़े रिश्ता-ए-दाम और अपना यार दम तोड़े
है बेहतर इस भड़कने से तड़पना ताइर-ए-दिल का

जहाँ में कामिलों को क़द्र है हम ख़ाकसारों की
शिकस्त-ए-दिल-गदा को टूटना है साग़र-ए-गुल का

अजब है रू-ए-जानाँ पर न होना एक भी तिल का
अदम करता नहीं तारों को जल्वा माह-ए-कामिल का

क़यामत लाएगा गुलज़ार में नाला अनादिल का
जगाना फ़ित्ना-ए-ख़्वाबीदा है सय्याद-ए-ग़ाफ़िल का

मैं मजनूँ देखते ही मर गया इस रश्क-ए-लैला को
कफ़न के वास्ते गोया फटा था पर्दा महमिल का

किया लबरेज़-ए-मरवारीद चश्म-ए-गौहर अफ़्शाँ से
गुमाँ गुज़रा जो दरिया पर मुझे दामान-ए-साहिल का

मिरा ख़्वाब-उल-अज़ीज़ ओ ग़ैरत-ए-ख़्वाब-ए-ज़ुलेख़ा है
तसव्वुर रात भर था मुझ को इक यूसुफ़-शमाइल का

मैं ऐसा ना-तवाँ हूँ सर उठाना मुझ को मुश्किल हो
बरा-ए-तौक़ गर्दन चाहिए छल्ला अनामिल का

कफ़न मिस्ल-ए-कताँ है टुकड़े टुकड़े 'अर्श' मदफ़न में
तसव्वुर मर गए पर भी है ये उस माह-ए-कामिल का