ख़ुदा मिरे दिल-ए-पुर-ख़ूँ को दाग़-दार करे
जो लाला-ज़ार मिरी ख़ाक से बहार करे
मुराद-ए-दिल है यही आरज़ू-ए-दिल है यही
ख़ुदा मुझे तिरी उल्फ़त से इश्तिहार करे
बना है शीशा-ए-साअत मिरा दिल-ए-नाज़ुक
ग़ुबार-ए-ख़ातिर-ए-याराँ का ता शुमार करे
फ़रौतनी के तसद्दुक़ से है सुबुक-पर्वाज़
न सर-कशी पे शरर अपनी इफ़्तिख़ार करे
ग़ज़ल
ख़ुदा मिरे दिल-ए-पुर-ख़ूँ को दाग़-दार करे
इश्क़ औरंगाबादी

