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ख़ुदा ख़ुदा कर के आए भी वो तो मुँह लपेटे पड़े हुए हैं | शाही शायरी
KHuda KHuda kar ke aae bhi wo to munh lapeTe paDe hue hain

ग़ज़ल

ख़ुदा ख़ुदा कर के आए भी वो तो मुँह लपेटे पड़े हुए हैं

मिर्ज़ा आसमान जाह अंजुम

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ख़ुदा ख़ुदा कर के आए भी वो तो मुँह लपेटे पड़े हुए हैं
न कहते हैं कुछ न सुनते हैं कुछ कसी से जैसे लड़े हुए हैं

हज़ार-हा मन्नतें करेंगे लिपट के क़दमों पे सर धरेंगे
न जाने देंगे न जाने देंगे अबस वो बिगड़े खड़े हुए हैं

सवाल करते हैं मुझ से क्या क्या पए-ख़ुदा मेरे राहबर आ
पड़ा मैं तकता हूँ तेरा रस्ता नकीर-ओ-मुंकिर खड़े हुए हैं

रही जो उन से तुम्हें कुदूरत तो बढ़ गई वहशियों की वहशत
उड़ाई इस दर्जा ख़ाक-ए-हसरत कमर कमर तक गड़े हुए हैं

इधर तो जीने से हम हैं आरी उधर मगाँते हो तुम सवारी
ये कैसी हैं गर्मियाँ तुम्हारी फफूले दिल में पड़े हुए हैं

फ़रेबी आँखें रसीली चितवन अदा इशारा निगाह रहज़न
ये अपने दो तीन हैं जो दुश्मन नज़र में अंजुम तड़े हुए हैं