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ख़ुद में खिलते हुए मंज़र से नुमूदार हुआ | शाही शायरी
KHud mein khilte hue manzar se numudar hua

ग़ज़ल

ख़ुद में खिलते हुए मंज़र से नुमूदार हुआ

दिलावर अली आज़र

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ख़ुद में खिलते हुए मंज़र से नुमूदार हुआ
वो जज़ीरा जो समुंदर से नुमूदार हुआ

मेरी तन्हाई ने पैदा किए साए घर में
कोई दीवार कोई दर से नुमूदार हुआ

चारों अतराफ़ मिरे आइने रक्खे गए थे
मैं ही मैं अपने बराबर से नुमूदार हुआ

आज की रात गुज़ारी है दिए ने मुझ में
आज का दिन मिरे अंदर से नुमूदार हुआ

क्या अजब नक़्श है वो नक़्श जो इस दुनिया के
कहीं अंदर कहीं बाहर से नुमूदार हुआ

एक शो'ले की लपक नूर में ढल कर आई
एक किरदार बहत्तर से नुमूदार हुआ

हक़ की पहचान हुई ख़ल्क़ को 'आज़र' उस वक़्त
जब अली आप के बिस्तर से नुमूदार हुआ