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ख़ुद में झाँका तो अजब मंज़र नज़र आया मुझे | शाही शायरी
KHud mein jhanka to ajab manzar nazar aaya mujhe

ग़ज़ल

ख़ुद में झाँका तो अजब मंज़र नज़र आया मुझे

रियाज़ मजीद

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ख़ुद में झाँका तो अजब मंज़र नज़र आया मुझे
अपने अंदर भी अजाइब घर नज़र आया मुझे

मुझ से उस का हम-सफ़र बनना भी कब देखा गया
वो भी अपनी राह का पत्थर नज़र आया मुझे

हादसों ने उस के पाँव से भी धरती खींच ली
वो भी सैल-ए-वक़्त की ज़द पर नज़र आया मुझे

मेहरबाँ कोई शरीक-ए-क़ैद-ए-तन्हाई न था
अपने ज़ानू पर ही अपना सर नज़र आया मुझे

दिल से थी उम्मीद ख़्वाहिश के सफ़र पर साथ दे
पर ये शाहीं भी शिकस्ता-पर नज़र आया मुझे

एक इक लम्हे ने सौ सौ शो'बदे दिखलाए हैं
सच तो ये है वक़्त जादूगर नज़र आया मुझे

इतनी हिम्मत भी न थी बढ़ कर बुला लेता 'रियाज़'
यूँ तो वो बाज़ार में अक्सर नज़र आया मुझे