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ख़िज़ाँ तन्हा न सैर-ए-बोस्ताँ को जा बिगाड़ आई | शाही शायरी
KHizan tanha na sair-e-bostan ko ja bigaD aai

ग़ज़ल

ख़िज़ाँ तन्हा न सैर-ए-बोस्ताँ को जा बिगाड़ आई

मिर्ज़ा अज़फ़री

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ख़िज़ाँ तन्हा न सैर-ए-बोस्ताँ को जा बिगाड़ आई
सबा भी चल के वाँ ऐ बुलबुलो फूलों को झाड़ आई

शब-ए-बीमार या काली बला या रात काली है
क़यामत आई या छाती पे ये हिज्राँ पहाड़ आई

जो आया यार तो तू हो चला ग़श ऐ दिवाने दिल
इसी दम तुझ को मरना था बता क्या तुझ को धाड़ आई

मसल है बर-महल ऐ 'अज़फ़री' जो कि गया कोई
हमारी बार को गुल छड़ गए काँटों की बाड़ आई