EN اردو
खींचा हुआ है गर्दिश-ए-अफ़्लाक ने मुझे | शाही शायरी
khincha hua hai gardish-e-aflak ne mujhe

ग़ज़ल

खींचा हुआ है गर्दिश-ए-अफ़्लाक ने मुझे

अंजुम सलीमी

;

खींचा हुआ है गर्दिश-ए-अफ़्लाक ने मुझे
ख़ुद से नहीं उतरने दिया चाक ने मुझे

मौज-ए-हवा में तैरता फिरता था मैं कहीं
फिर यूँ हुआ कि खींच लिया ख़ाक ने मुझे

मैं रौशनी में आ के पशेमाँ बहुत हुआ
उर्यां किया है इश्क़ की पोशाक ने मुझे

आईने की तरह था मैं शफ़्फ़ाफ़ ओ आब-दार
गदला दिया है चशम-ए-हवस-नाक ने मुझे

ख़ुश्बू सा मैं ग़िलाफ़ के अंदर मुक़ीम था
और खो दिया है सीना-ए-सद-चाक ने मुझे

अपने सिवा जहाँ में कोई सूझता नहीं
ला फेंका है कहाँ मिरे इदराक ने मुझे