खेल था अपनी अना का इश्क़ उसे समझा किया
मैं ने अपने आप से कितना बड़ा धोका किया
उम्र-भर का हम-नफ़स इक पल में रुख़्सत हो गया
और मैं ख़ामोश उसे जाते हुए देखा किया
इक ज़रा सी बात पर रूठा रहा वो देर तक
मुस्कुरा के ख़ुद ही फिर मेरी तरफ़ चेहरा किया
फ़िक्र की लज़्ज़त के बाइ'स हैं मिरी नाकामियाँ
सब अमल करते रहे और मैं फ़क़त सोचा किया
ज़ख़्म की इक आग थी जिस से सुख़न रौशन रखा
दर्द की इक लहर थी मैं ने जिसे नग़्मा किया
सब ही कुछ उस से न कहना था जो तेरे दिल में था
शिद्दत-ए-इज़हार में तू ने 'फ़रासत' क्या किया
ग़ज़ल
खेल था अपनी अना का इश्क़ उसे समझा किया
फ़रासत रिज़वी

