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ख़याल-ए-दोस्त न मैं याद-ए-यार में गुम हूँ | शाही शायरी
KHayal-e-dost na main yaad-e-yar mein gum hun

ग़ज़ल

ख़याल-ए-दोस्त न मैं याद-ए-यार में गुम हूँ

सिराज लखनवी

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ख़याल-ए-दोस्त न मैं याद-ए-यार में गुम हूँ
ख़ुद अपनी फ़िक्र-ओ-नज़र की बहार में गुम हूँ

ख़ुशी से जब्र-ज़दा इख़्तियार में गुम हूँ
अजीब दिलकशी-ए-नागवार में गुम हूँ

ख़ुद अपनी याद-ए-फ़रामोश-कार में गुम हूँ
बहाना ये है तिरे इंतिज़ार में गुम हूँ

न मोहतसिब की ख़ुशामद न मय-कदे का तवाफ़
ख़ुदी में मस्त हूँ अपनी बहार में गुम हूँ

तिरा जमाल भी देखूँगा वक़्त आने दे
अभी तो अपने ही आईना-ज़ार में गुम हूँ

तू ही पुकार मिरा नाम ले के ऐ ग़म-ए-इश्क़
पड़ा है वक़्त ग़म-ए-रोज़गार में गुम हूँ

न शाम की है ख़बर और न सुब्ह की पहचान
'सिराज' गर्दिश-ए-लैल-ओ-नहार में गुम हूँ