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ख़ौफ़-ज़दा लोगों से रस्म-ओ-राह बढ़ाते फिरते हैं | शाही शायरी
KHauf-zada logon se rasm-o-rah baDhate phirte hain

ग़ज़ल

ख़ौफ़-ज़दा लोगों से रस्म-ओ-राह बढ़ाते फिरते हैं

मोहसिन असरार

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ख़ौफ़-ज़दा लोगों से रस्म-ओ-राह बढ़ाते फिरते हैं
हम बे-ख़्वाबी के मौसम में ख़्वाब दिखाते फिरते हैं

बन-ठन कर चलते हैं घर से और उस कूचा में नहीं जाते
रस्ता रस्ता रहगीरों से हाथ मिलाते फिरते हैं

हम दीवाने हम को यारा कब है शोर मचाने का
हम तो अपने अंदर की आवाज़ छुपाते फिरते हैं

लोगो मन का भेद न खोलो लेकिन कुछ मुँह से बोलो
ये सन्नाटे पस-ए-मंज़र में शोर मचाते फिरते हैं

हम ने तेरे हिज्र को आख़िर कार-ए-जहाँ तस्लीम किया
दुनिया-दारी करते हैं और ध्यान बटाते फिरते हैं

बस्ती में क्या चीज़ नहीं जो वीराने में होती है
लोग पुराने ग़ारों में क्यूँ दीप जलाते फिरते हैं

जब भी तेरी याद आती है दिल बहलाना पड़ता है
पहरों तन्हा सड़कों पर हम गाने गाते फिरते हैं

ये आवारा लोग नहीं हैं ढूँड रहे हैं बस्ती को
हम भी तेरे शहर की गलियों में चकराते फिरते हैं

बिन बरती हर चीज़ में 'मोहसिन' इक दिन घुन लग जाता है
उस डर से हम अपने बदन को धूप लगाते फिरते हैं