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ख़स-ए-बदन में ब-रंग-ए-शरार आए कोई | शाही शायरी
KHas-e-badan mein ba-rang-e-sharar aae koi

ग़ज़ल

ख़स-ए-बदन में ब-रंग-ए-शरार आए कोई

जावेद शाहीन

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ख़स-ए-बदन में ब-रंग-ए-शरार आए कोई
चमक उठूँ मैं ग़म-ए-आब-दार आए कोई

मिरी नज़र में चमकते हैं गर्म-ओ-सर्द जहाँ
मैं जाँच लूँगा ज़र-ए-कम-अयार आए कोई

है ज़ख़्म ज़ख़्म बदन संग-ए-हर्फ़-ए-तल्ख़ से आज
कहीं से नर्मी-ए-लब की फुवार आए कोई

मैं जल गया दिल-ए-वीराँ की ख़ुश्क वादी में
फ़राज़-ए-दर्द से फिर आबशार आए कोई

ये दश्त-ए-तिश्ना-लबी छोड़ कर मैं क्यूँ जाऊँ
मिरे लिए तो यहीं जू-ए-बार आए कोई

है ज़ो'म-ए-शो'ला तो देखे हवा-ए-दर्द का ज़ोर
चराग़ है तो सर-ए-रहगुज़ार आए कोई

इक और भी है जहाँ इस जहान-ए-जब्र से दूर
मजाल है तो वहाँ शहरयार आए कोई

ग़नीम-ए-शब को मैं ज़ख़्मों से चूर कर आया
सहर का आख़िरी नेज़ा भी मार आए कोई

ठहर गए हैं कहाँ मेरे हम-सफ़र 'शाहीं'
खड़ा हूँ देर से जंगल के पार आए कोई