ख़ंजर की तरह बू-ए-समन तेज़ बहुत है
मौसम की हवा अब के जुनूँ-ख़ेज़ बहुत है
रास आए तो है छाँव बहुत बर्ग ओ शजर की
हाथ आए तो हर शाख़ समर-रेज़ बहुत है
लोगो मिरी गुल-कारी-ए-वहशत का सिला क्या
दीवाने को इक हर्फ़-ए-दिल-आवेज़ बहुत है
मुनइम की तरह पीर-ए-हरम पीते हैं वो जाम
रिंदों को भी जिस जाम से परहेज़ बहुत है
मस्लूब हुआ कोई सर-ए-राह-ए-तमन्ना
आवाज़-ए-जरस पिछले पहर तेज़ बहुत है
'मजरूह' सुने कौन तिरी तल्ख़-नवाई
गुफ़्तार-ए-अज़ीज़ाँ शकर-आमेज़ बहुत है

ग़ज़ल
ख़ंजर की तरह बू-ए-समन तेज़ बहुत है
मजरूह सुल्तानपुरी