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खड़े हैं देर से अहबाब देखने के लिए | शाही शायरी
khaDe hain der se ahbab dekhne ke liye

ग़ज़ल

खड़े हैं देर से अहबाब देखने के लिए

आलम ख़ुर्शीद

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खड़े हैं देर से अहबाब देखने के लिए
मिरा सफ़ीना तह-ए-आब देखने के लिए

खुली जो आँख तो हम डूबते नज़र आए
गए थे दूर से गिर्दाब देखने के लिए

अबस परेशाँ हैं ता'बीर की तग-ओ-दौ में
मिली है नींद हमें ख़्वाब देखने के लिए

तरस रही है मिरे दश्त की फ़ज़ा कब से
किसी दरख़्त को शादाब देखने के लिए

उड़ान भरने लगे हैं तयूर-ओ-तय्यारे
क़रीब-ओ-दूर से सैलाब देखने के लिए

सुना है मैं ने हवाएँ भी बे-क़रार हैं अब
मिरे दिए को ज़फ़र-याब देखने के लिए

नज़र झुकाए खड़ी हैं अक़ीदतें 'आलम'
शिकस्त-ए-गुंबद-ओ-मेहराब देखने के लिए