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ख़ाना-ए-दिल में दाग़ जल न सका | शाही शायरी
KHana-e-dil mein dagh jal na saka

ग़ज़ल

ख़ाना-ए-दिल में दाग़ जल न सका

अर्श मलसियानी

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ख़ाना-ए-दिल में दाग़ जल न सका
इस में कोई चराग़ जल न सका

न हुए वो शरीक-ए-सोज़-ए-निहाँ
दिल से दिल का चराग़ जल न सका

सोज़-ए-उल्फ़त से अक़्ल है महफ़ूज़
जल गया दिल दिमाग़ जल न सका

बर्क़ था इज़्तिराब-ए-दिल लेकिन
आरज़ूओं का बाग़ जल न सका

दिल-ए-मायूस में उमीद कहाँ
बुझ के फिर ये चराग़ जल न सका

रौशनी-ए-शुऊर भी आई
फिर भी दिल का चराग़ जल न सका

'अर्श' क्या तुझ से फ़ैज़ महफ़िल को
तू मिसाल-ए-चराग़ जल न सका