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कौन गुमाँ यक़ीं बना कौन सा घाव भर गया | शाही शायरी
kaun guman yaqin bana kaun sa ghaw bhar gaya

ग़ज़ल

कौन गुमाँ यक़ीं बना कौन सा घाव भर गया

पीरज़ादा क़ासीम

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कौन गुमाँ यक़ीं बना कौन सा घाव भर गया
जैसे सभी गुज़र गए 'जौन' भी कल गुज़र गया

उस का चराग़-ए-वस्ल तो हिज्र से राब्ते में था
वो भी न जल सका उधर ये भी इधर बिखर गया

ज़ीस्त की रौनक़ें तमाम उस की तलाश में रहीं
और वो ग़म-नज़ाद 'जौन' किस को ख़बर किधर गया

गाम-ब-गाम इक बहिश्त और वो उस की एक हश्त
राह में भी रुका नहीं और न अपने घर गया

रस्म-ए-सुपुर्दगी को कब दर्खुर-ए-ए'तिना कहा
ख़ुद से जो था गुरेज़-पा सब से गुरेज़ कर गया

उस के सुख़न का मो'जिज़ा उस की नहीं में देखिए
हाँ भी है माजरा मगर 'जौन' कहाँ उधर गया

उस को था सख़्त इख़्तिलाफ़ ज़ीस्त के मत्न से सो वो
बर-सर-ए-हाशिया रहा और कमाल कर गया

उस के ख़याल की नुमूद अहद-ब-अहद जावेदाँ
बस ये कहो कि 'जौन' है ये न कहो कि मर गया