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करते हैं चैन बैठे हुस्न-ओ-जमाल वाले | शाही शायरी
karte hain chain baiThe husn-o-jamal wale

ग़ज़ल

करते हैं चैन बैठे हुस्न-ओ-जमाल वाले

मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही

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करते हैं चैन बैठे हुस्न-ओ-जमाल वाले
फिरते हैं मारे मारे क्या क्या कमाल वाले

मेरी तरह से एक दिन बाज़ार से जहाँ के
जावेंगे हाथ ख़ाली जितने हैं ताल वाले

दम दे के फाँसता है उश्शाक़ के दिनों को
मैं जानता हूँ तुझ को ज़ुल्फ़ों के जाल वाले

महशर का मा'रका हो जिस दम जहाँ के अंदर
उस दिन हमें बचाना ओ लम्बी ढाल वाले

बुलबुल हैं तेरे हम भी बाग़-ए-जहाँ के अंदर
ओ गुल से गाल वाले सुम्बुल से बाल वाले

तन्हा लहद के अंदर होंगे गदा की सूरत
जितने हैं इस जहाँ में जाह-ओ-जलाल वाले

ज़ुल्फ़-ए-शब-ए-जुदाई तेरी बुरी बला है
इस का ख़याल रखना ओ लम्बे बाल वाले

आशिक़ हैं हम भी तेरे अबरू के और रुख़ के
हम को भी याद रखना बद्र-ओ-हिलाल वाले

भूले हैं दो-जहाँ को सुद-बुद नहीं किसी की
जो जो हैं इस जहाँ में तेरे ख़याल वाले

सय्याद ने बिछाया गुलशन में दाम-ओ-दाना
सुन गुल-एज़ार वाले ओ ख़त्त-ओ-ख़ाल वाले

मेरी तरह से इक दिन बाज़ार से जहाँ के
जाएँगे हाथ ख़ाली जितने हैं माल वाले

मंसूर-ओ-क़ैस-ओ-वामिक़ फ़र्हाद-ओ-'मुंतही' से
क्या क्या गए जहाँ से फ़ज़्ल-ओ-कमाल वाले