कर्ब की लज़्ज़तों को ढूँडेंगे
हम नए मह-वशों को ढूँडेंगे
जो तिरे प्यार का बदल न बनें
फिर उन्ही हसरतों को ढूँडेंगे
नीम-जाँ लोग चियूँटियों की तरह
रिज़्क़ के मख़ज़नों को ढूँडेंगे
शहर वाले तो कब के सो भी गए
किस लिए क़हक़हों को ढूँडेंगे
बे-सुकूँ शख़्स खोजियों की तरह
अपने अपने घरों को ढूँडेंगे
टहनियाँ कोंपलों को तरसेंगी
पेड़ ताज़ा रुतों को ढूँडेंगे
रात के वक़्त कितने सर्द मिज़ाज
जिस्म की हिद्दतों को ढूँडेंगे
अब 'नियाज़' अपनी ज़र्द आँखों में
हम गई रौनक़ों को ढूँडेंगे
ग़ज़ल
कर्ब की लज़्ज़तों को ढूँडेंगे
नियाज़ हुसैन लखवेरा

