कर के दिल को शिकार आँखों में
घर करे है तू यार आँखों में
चश्म-ए-बद दूर हो नज़र न कहीं
है निपट ही बहार आँखों में
और सब चेहरा-बाज़ियों के सिवा
इश्वा है सद-हज़ार आँखों में
क्या कहूँ कुछ कही नहीं जाती
बातें हैं बे-शुमार आँखों में
जिस घड़ी घूरते हो ग़ुस्सा से
निकले पड़ता है प्यार आँखों में
तीर-ए-मिज़्गाँ दिलों के पार हुए
है ये गुज़र ओ गुज़ार आँखों में
यार तेरे लिए ये गौहर-ए-अश्क
थे बरा-ए-निसार आँखों में
अश्क-ए-ख़ूनीं के ये नहीं क़तरे
ये रहे हैं शरार आँखों में
देखना टुक 'असर' से नज़रें मिला
क्या हुए थे क़रार आँखों में
ग़ज़ल
कर के दिल को शिकार आँखों में
मीर असर

