EN اردو
कर के दिल को शिकार आँखों में | शाही शायरी
kar ke dil ko shikar aankhon mein

ग़ज़ल

कर के दिल को शिकार आँखों में

मीर असर

;

कर के दिल को शिकार आँखों में
घर करे है तू यार आँखों में

चश्म-ए-बद दूर हो नज़र न कहीं
है निपट ही बहार आँखों में

और सब चेहरा-बाज़ियों के सिवा
इश्वा है सद-हज़ार आँखों में

क्या कहूँ कुछ कही नहीं जाती
बातें हैं बे-शुमार आँखों में

जिस घड़ी घूरते हो ग़ुस्सा से
निकले पड़ता है प्यार आँखों में

तीर-ए-मिज़्गाँ दिलों के पार हुए
है ये गुज़र ओ गुज़ार आँखों में

यार तेरे लिए ये गौहर-ए-अश्क
थे बरा-ए-निसार आँखों में

अश्क-ए-ख़ूनीं के ये नहीं क़तरे
ये रहे हैं शरार आँखों में

देखना टुक 'असर' से नज़रें मिला
क्या हुए थे क़रार आँखों में