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कलाम-ए-सख़्त कह कह कर वो क्या हम पर बरसते हैं | शाही शायरी
kalam-e-saKHt kah kah kar wo kya hum par baraste hain

ग़ज़ल

कलाम-ए-सख़्त कह कह कर वो क्या हम पर बरसते हैं

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

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कलाम-ए-सख़्त कह कह कर वो क्या हम पर बरसते हैं
लब उन के ला'ल हैं पर ला'ल से पत्थर बरसते हैं

बना गर क़तरा वाँ गौहर तो याँ गौहर बरसते हैं
हमारे दीदा-ए-तर अब्र से बेहतर बरसते हैं

अरक़ रुख़ का नक़ाब-ए-रुख़ से जब टपका तो हम समझे
कि मह पर छा रहा है अब्र और अख़्तर बरसते हैं

झपकना जिस ने देखा हो तिरी पलकों का वो जाने
वगर्ना कौन माने गर कहूँ ख़ंजर बरसते हैं

तमाशा देख सैलाब-ए-बहारी पर हबाबों का
उठा ला शीशा साक़ी अब्र से साग़र बरसते हैं

तिरे दर पर गदा-ओ-शह के ग़श खा खा के गिरने से
दिल-ओ-जाँ बहते फिरते हैं सर-ओ-अफ़सर बरसते हैं

सरिश्क-ए-चश्म से नाले रवाँ होते नहीं देखे
कहे कौन इस को रोना दीदा-हा-ए-तर बरसते हैं

जला ख़िर्मन तो क्या पर जो धुएँ उठते हैं ख़िर्मन से
सितम है बन के बादल किश्त-ए-दुश्मन पर बरसते हैं

मिरी हस्ती मगर फ़स्ल-ए-बहार-ए-शो'ला है 'नाज़िम'
शरर फलते हैं दाग़ उगते हैं और अख़गर बरसते हैं