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कल रात मेरे साथ अजब हादिसा हुआ | शाही शायरी
kal raat mere sath ajab hadisa hua

ग़ज़ल

कल रात मेरे साथ अजब हादिसा हुआ

सुलेमान ख़ुमार

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कल रात मेरे साथ अजब हादिसा हुआ
सूरज पिघल के मेरी हथेली पे आ गिरा

देखे हैं मेरी आँखों ने मंज़र अजब अजब
इक पेड़ मेरे शहर का सायों को खा गया

सहरा में आब और समुंदर में रेत है
या-रब मैं आज कौन सी दुनिया में आ गया

कैसा तमाशा देखा था हम ने ये रात भर
तारे चमक रहे थे मगर आसमाँ न था

रहज़न तो ख़ुद ही डर के गुफाओं में छुप गए
अब राह-रौ को लूटता फिरता है रास्ता

इन साअ'तों को सुब्ह कहें भी तो किस तरह
सूरज उगा हुआ था अँधेरा छटा न था

बादल बरस रहे हैं मुसलसल मगर 'ख़ुमार'
दरिया तमाम ख़ुश्क हैं झरनों को क्या हुआ