कल जो तुम ईधर से गुज़रे हम नज़र कर रह गए
जी में था कुछ कहिए लेकिन आह डर कर रह गए
जब न कुछ बस चल सका अपना तो फिर हसरत से हाए
देख कर मुँह को तिरे इक आह भर कर रह गए
सर बहुत पटका क़फ़स में अपना हम ने हम-सफ़ीर
कुइ न पहुँचा दाद को फ़रियाद कर कर रह गए
नामा-बर की या कबूतर की कि दिल की रखिए आस
अपने तो याँ से गए जो वाँ वो मर कर रह गए
कल किसी का ज़िक्र-ए-ख़ैर आया था मज्लिस में 'हसन'
इस दिल-ए-बेताब पर हम हाथ धर कर रह गए
ग़ज़ल
कल जो तुम ईधर से गुज़रे हम नज़र कर रह गए
मीर हसन

