EN اردو
कैसे बदल रहे हो बताता नहीं है क्या | शाही शायरी
kaise badal rahe ho batata nahin hai kya

ग़ज़ल

कैसे बदल रहे हो बताता नहीं है क्या

उबैद सिद्दीक़ी

;

कैसे बदल रहे हो बताता नहीं है क्या
आईना कोई तुम को दिखाता नहीं है क्या

ख़ल्क़-ए-ख़ुदा का ख़ौफ़ तो दिल में नहीं रहा
तुम को ख़ुदा का ख़ौफ़ भी आता नहीं है क्या

तारीक लग रही है है शब-ए-माहताब भी
कोई यहाँ चराग़ जलाता नहीं है क्या

बाशिंदगान-ए-शहर सभी महव-ए-ख़्वाब हैं
इन को तिलिस्म-ए-शब भी जगाता नहीं है क्या