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कहूँ क्या दिल उड़ाने का तिरा कुछ ढब निराला था | शाही शायरी
kahun kya dil uDane ka tera kuchh Dhab nirala tha

ग़ज़ल

कहूँ क्या दिल उड़ाने का तिरा कुछ ढब निराला था

मीर असर

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कहूँ क्या दिल उड़ाने का तिरा कुछ ढब निराला था
वगर्ना हर तरह से अब तलक तो मैं सँभाला था

कहाँ अब खुल के वो रोना किधर वो अश्क की शोरिश
कभू कुछ फूट बहता है जिगर पर वो जो छाला था

हुआ आवारा-ए-दश्त-ओ-बयाबाँ देखते अपने
वो तिफ़्ल-ए-अश्क जो उल्फ़त से आँखों बीच पाला था

तिरा ग़म खा गया मेरा कलेजा दिल सभी यक बार
हुआ होगा कहाँ से सेर ये तो इक निवाला था

अभी तो लग न चलना था 'असर' उस गुल-बदन के साथ
कोई दिन देखना था ज़ख़्म-ए-दिल बे-तरह आला था